सुभाष मेहता, वरिष्ठ पत्रकार 

                                                                    भारतीय राजनीति में प्रतीकों, शब्दों और परिभाषाओं का खेल हमेशा से सत्ता की चाबी तय करता रहा है। इस समय राजस्थान, मध्य प्रदेश और गुजरात की सीमाओं को छूने वाले देश के विशाल ट्राइबल बेल्ट में एक नया और बेहद संवेदनशील वैचारिक टकराव चरम पर है। यह टकराव केवल चुनावी नहीं है, बल्कि यह एक गहरी सांस्कृतिक और संवैधानिक अस्मिता की लड़ाई है, जिसे आदिवासी बनाम वनवासी के नैरेटिव के रूप में देखा जा रहा है।

दशकों से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी 'वनवासी कल्याण आश्रम' के जरिए जनजातीय क्षेत्रों में सेवा कार्य, शिक्षा और सांस्कृतिक समन्वय का ताना-बाना बुनते आए हैं। भाजपा और संघ की वैचारिक दलील रही है कि वनवासी शब्द में एक सांस्कृतिक अपनापन है, जो भारत की प्राचीन सनातन परंपरा, जैसे रामायण काल में निषादराज, शबरी और भगवान राम के संदर्भों से इस समाज को जोड़ता है। इस नीति का मुख्य उद्देश्य जनजातीय समाज को मुख्यधारा के वृहद हिंदू समाज के एक अभिन्न हिस्से के रूप में स्थापित करना रहा है, जिससे उन्हें किसी भी प्रकार की अलगाववादी भावना से दूर रखा जा सके। लेकिन हाल के वर्षों में, विशेषकर भारत आदिवासी पार्टी (BAP) के उदय के बाद, इस स्थापित शब्दावली को लेकर एक तीखा क्षेत्रीय और राष्ट्रीय असंतोष भड़क उठा है।

संसद से लेकर सड़क तक, भारत आदिवासी पार्टी ने वनवासी शब्द को आदिवासियों के अपमान और उनके अधिकारों को सीमित करने की एक सोची-समझी सियासी साजिश के रूप में पेश किया है। हाल ही में देश के राजनीतिक पटल पर उभरे इस नए मोर्चे ने वागड़ यानी डूंगरपुर-बांसवाड़ा क्षेत्र से लेकर पूरे मध्य भारत में इस मुद्दे को हवा दी है। गृह मंत्री द्वारा एक कार्यक्रम में इस शब्द का प्रयोग किए जाने के बाद इस दल के कार्यकर्ताओं ने न केवल पुतले फूंके, बल्कि राष्ट्रपति तक को ज्ञापन सौंपे। इस नई राजनीति का नैरेटिव सीधा, तीखा और युवाओं को आकर्षित करने वाला है, जिसके तहत वे खुद को इस देश का पहला मालिक यानी आदिवासी मानते हैं, न कि सिर्फ जंगल में रहने वाला वनवासी। यह विमर्श आदिवासियों के बीच इसलिए तेजी से लोकप्रिय हो रहा है क्योंकि यह सीधे तौर पर उनके स्वाभिमान, जल-जंगल-जमीन के पारंपरिक मालिकाना हक और पांचवीं अनुसूची के तहत मिलने वाले संवैधानिक अधिकारों से जुड़ता है।

इस विवाद में केवल भारत आदिवासी पार्टी ही नहीं, बल्कि मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस भी पूरी ताकत से कूद चुकी है। लोकसभा चुनावों से लेकर अपनी विभिन्न यात्राओं के दौरान राहुल गांधी ने बार-बार इस मुद्दे को मुखरता से उठाया है। कांग्रेस का सीधा आरोप है कि भाजपा आदिवासियों को वनवासी कहकर उनके उस ऐतिहासिक दर्जे को खत्म करना चाहती है जो उन्हें देश का मूल निवासी मानता है। विपक्ष का तर्क है कि वनवासी कहकर उनके जल, जंगल और जमीन को कॉर्पोरेट्स को सौंपने का रास्ता साफ किया जा रहा है, क्योंकि वनवासी का मतलब सिर्फ जंगल में रहने वाला होता है, जंगल का मालिक नहीं।

इस चौतरफा हमले के बीच भाजपा बैकफुट पर आने के बजाय अपने ठोस कल्याण और गौरव के नैरेटिव से इसका मुकाबला कर रही है। सत्ताधारी दल प्रतीकों की राजनीति के तहत द्रौपदी मुर्मू के रूप में देश को पहली आदिवासी महिला राष्ट्रपति देने, भगवान बिरसा मुंडा की जयंती को राष्ट्रीय स्तर पर जनजातीय गौरव दिवस घोषित करने और आदिवासी कल्याण बजट में रिकॉर्ड बढ़ोतरी जैसी कल्याणकारी योजनाओं को सामने रख रहा है।

यह विवाद सिर्फ व्याकरण या भाषाशास्त्र का नहीं है, बल्कि यह शुद्ध रूप से चुनावी प्रभुत्व और सामाजिक ध्रुवीकरण की राजनीति है। एक तरफ जहां भाजपा वनवासी नैरेटिव के जरिए जनजातीय समाज को वृहद हिंदू पहचान का हिस्सा बनाकर अपने ट्राइबल वोट बैंक को एकजुट रखना चाहती है, वहीं दूसरी तरफ भारत आदिवासी पार्टी और विपक्ष इस समाज की एक स्वतंत्र, स्वायत्त और 'मूल निवासी' की पहचान को उभारकर भाजपा के इस पारंपरिक गढ़ में सेंध लगाने की कोशिश में हैं।

यदि यह नया मोर्चा आदिवासियों के मन में यह धारणा पक्की करने में कामयाब रहा कि वनवासी शब्द उनके आरक्षण, जमीन और मूल पहचान को कमजोर कर देगा, तो मध्य और पश्चिमी भारत की दर्जनों सीटों पर भाजपा के लिए अपने किलों को बचाना एक बड़ी चुनौती बन जाएगा। आने वाले समय में यह भाषाई और वैचारिक जंग भारतीय राजनीति की एक बेहद निर्णायक धुरी बनने

जा रही है।